बाराबंकी की पूजा पाल ने बनाया धूल रहित थ्रेशर

बाराबंकी की रहने वाली इंटरमीडिएट की छात्रा पूजा पाल आज देशभर के लाखों बच्चों के लिए मिसाल बन चुकी हैं. मिट्टी-खपरैल के घर, दीये की रोशनी और गरीबी से लड़ते हुए पूजा ने वो कर दिखाया, जो अक्सर संसाधनों से भरपूर बच्चे भी नहीं कर पाते. लेकिन इस गौरव के पीछे एक कड़वी हकीकत भी छिपी है।जिस दीये की लौ में सपना पनपा, उसी रोशनी में पढ़ाई कर एक बेटी ने ऐसा कर दिखाया, जिससे पूरा देश गर्व से भर गया. बाराबंकी की रहने वाली पूजा जो एक झोपड़ी में पली-बढ़ी, आज जापान में भारत का प्रतिनिधित्व कर आई है. मगर विडंबना देखिए जिस बच्ची ने विदेश में तिरंगे की शान बढ़ाई, उसके घर में आज भी बिजली नहीं , न ही शौचालय है.

आइए आपको बताते हैं पूजा के संघर्ष की अनोखी कहानी के बारे में….

कहां की रहने वाली है पूजा?

सिरौलीगौसपुर तहसील के अगेहरा गांव की रहने वाली इंटरमीडिएट की छात्रा पूजा आज देशभर के लाखों बच्चों के लिए मिसाल बन चुकी हैं. जून 2025 में भारत सरकार की ओर से पूजा को विज्ञान मॉडल प्रदर्शनी के लिए जापान भेजा गया. वहां उन्होंने “धूल रहित थ्रेशर मशीन” जैसे मॉडल से देश की प्रतिभा का परचम लहराया.

लेकिन जब वो जापान से लौटीं, तो फिर उसी अंधेरे झोपड़े में वापस आ गईं,जहां बिजली का मीटर तो लगा है, लेकिन घर तक तार खींचने के पैसे नहीं हैं. जिस घर में दीया जलाकर पढ़ा, वहां अब भी उजाले का इंतजार है.

झोपड़ी से जापान तक का सफरपूजा का घर एक साधारण झोपड़ी है, जहां वह अपने माता-पिता और पांच भाई-बहनों के साथ रहती हैं. पिता पुत्तीलाल मजदूरी करते हैं और मां सुनीला देवी एक सरकारी स्कूल में रसोइया हैं. दीये की रोशनी में पढ़ाई करने वाली पूजा घर का काम भी संभालती हैं. चारा काटना, पशुओं की देखभाल और छोटे भाई-बहनों को पढ़ाना, सब कुछ खुद करती हैं.कक्षा 8 में बना डाला विज्ञान मॉडलपूजा की प्रतिभा पहली बार तब सामने आई जब वह कक्षा 8 में थीं. उन्होंने “धूल रहित थ्रेशर मशीन” का मॉडल बनाया, जिससे खेतों में उड़ने वाली धूल एक थैले में इकट्ठा हो जाती थी.

यह मॉडल पर्यावरण और किसानों दोनों के लिए उपयोगी था. लगभग 3 हजार रुपये में बना यह मॉडल जिला, मंडल, राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा. 2024 में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय विज्ञान मेले में भी पूजा का चयन हुआ…

गांव के बच्चों को पढ़ानाअब पूजा का सपना है कि वह अपने गांव के गरीब बच्चों को शिक्षित करें और उन्हें आगे बढ़ने की राह दिखाएं. उनका मानना है कि प्रतिभा कभी संसाधनों की मोहताज नहीं होती, बस जरूरत है सही मार्गदर्शन और सहयोग की. पूजा की कहानी जहां संघर्ष और सफलता की मिसाल है, वहीं यह प्रशासन और सिस्टम से एक बड़ा सवाल भी करती है. क्या एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिभा को घर में बिजली और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं दिलाना इतना मुश्किल है?..

पूजा पाल नेपिता पुत्तीलाल पाल व माता सुनीला पाल के साथ अपने टीचर राजीव श्रीवास्तव का नाम ऊँचा करते हुए बाराबंकी उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश का नाम रोशन किया है।

The Shepherd Times ऐसी प्रतिभा को Salute करता है।

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